द ग्रेट भर

 1-भारत जैसे देश में पहले की जो शासन व्यवस्था थी उसमें पुरोहित(देशी ब्राहमण 8 वी शदी के बाद विदेशी भी शामिल हो गये) क्षत्रिय (सैन्य कार्य करने वाले लोग 8 वी शदी के बाद विदेशी भी शामिल हो गये) राजा (आज के राजभर जाति के लोग) कायस्थ(लेखक का कार्य करने वाले लोग/आज इसमें कुछ विदेशी भी शामिल हो गये) इस बात के प्रमाण के लिये अंग्रेज लेखकों के कुछ लेख निम्न प्रकार प्रस्तुत कर रहा हूॅ। शायद इसे पढ़ने के बाद राजभरों को चाहिए कि देश को बचाने के लिये सबसे पहले स्वयं को ज्ञान वान गुणवान बनने का प्रयास करना चाहिए जब स्वयं ज्ञान गुणवान होगे तो अन्दर की उर्जा का सकारात्मक उपयोग करके सब कुछ अच्छा करने का प्रयास करेगे -

1. मि0 शेरिंग साहब ने हिन्दू ट्राईब्स एण्ड कास्ट चेप्टर के पृष्ठ 357 में अंकित किया है कि भर या भार जाति उत्तरी भारत के गोरखपुर से मध्य भारत के सागर जिले तक पायी जाती है। यहाॅ के निवासी इस जाति को भार, राजभर, भरपतवा के नाम से संबोधित करते है। 

2. मि0 डब्लू कोका साहब तथा मि0 सरहेनरी एलियट अंकित करते है कि भरों का संबंध भरताज बंश से है, जिनकी पीढ़ी जयध्वज से संबंधित है। 

3. दी ओरिजनल हैविटेन्स आफ भारतवर्ष आर इंडिया पृष्ठ 3 व 36 में मि0 हरबंश साहब अंकित किये है कि भरताज बहुत से है अब से कुछ समय पहले भर लोग अपने को भर कहे जाने पर बहुत बड़ा अपमान समझते थे । यह उस समय जबकि प्रारम्भ में भरताज या भारशिव अथवा अन्य शब्दो ंका अपभ्रश केवल भर शब्द से उन्हें पुकारते थे। उस समय उन्हें इस अपमानित शब्द से क्षोभ और लज्जा होती थी । क्रोध भी उमड़ आता था, लेकिन वे अपनी सोचनीय अवस्था को सोचकर शर्म खाते थे । 

4. मिस्टर पी0 करनेगी रिसर्च आफ अवध पृष्ठ 19 में लिखते है कि भर लोग राजपूत बंश के है और पहले ये लोग यहाॅ के राजा थे । कालान्तर में बौद्ध मत स्वीकार कर लेने के पश्चात् इनके प्रचारार्थ अधिकांश अन्य देशो मे ंचले गये । इनकी मुख्य जाति राजभर, भारद्वाज और कन्नौजिया की है। मिर्जापुर में इनके तीन गोत्र है। 

5. मिस्टर रिकटस रिपोर्ट पृष्ठ 128 में अंकित है कि भर जाति का संबंध अवश्य उच्च जातियों से है। क्योकि इनके प्रमाण विशेष रूप से पाये जाते हैं । इलाहाबाद में भरोर्स, गहरोर्स, तिकइत लोग भरो के बंशज कहे जाते हैं । कही कही राजपूत लोग अब भी अपने लड़कों की शादियों भरो की लड़कियो से करते हैं । 

6. दी ओरिजनल हैविटेन्ट आफ भारत वर्ष आर इंडिया पृष्ठ 44, 45, 46 में मिस्टर गोस्टव आपर्ट साहब लिखते है कि एक भर राजा जिनकी चार स्त्रियाॅ थी, जिनमें एक स्वजातीय और तीन अन्य जाति की थी । अंत में जिन बंशो के पास आजकल भूमि है और अपने को प्राचीन राजपूत की संतान कहते है चाहे वे लोक सम्मान के भय और समाज की लज्जा से इा बात को स्वीकार न करे, परन्तु वास्तव में वे भरो के बंशज है। क्योकि किसी समय इस देश के प्रत्येक एकड़ भूमि पर भरो का अधिपत्य और बोलबाला था। 

7. डा0 फान्सिस बचुनान लिखते है कि परिहार राजपूत शाहबाद के निवासी भरो के बंशज है । किसी समय भर लोग अपनी जाति को बदलकर दूसरी जाति की संस्कृति और सभ्यता को अपनाये । ऐसी प्रथा उस समय भारतवर्ष में बहुत थी । भिन्न-भिन्न जातियों में छिन्न-भिन्न हो जाना भरों का लुप्त हो जाना स्वाभाविक है। इसके अतिरिक्त भर जाति के लोग अपने अस्तित्व को अन्य जातियों के साथ युद्ध करने में नष्ट कर डाले, परन्तु जिस पर भी वे आज अधिक संख्या में पाये जाते है। वर्तमान समय में बहुत से राजपूत अपनी अंतड़ियों में भरो का खून रखते है। 

8. हिन्दू ट्राइब्स एण्ड कास्ट पृष्ठ 367 में सरहेरनी एलियट साहब का उल्लेख है कि इस जाति का संबंध बहुत महत्व का है। भर राजाअें के बहुत से पत्थर के किले, खाईयाॅ, भयानक कन्दराये, गुफाये और तालाब गोरखपुर, आजमगढ़, गाजीपुर, बनारस, मिर्जापुर, जौनपुर, इलाहाबाद तथा अवध प्रान्त में पाये जाते हैं, जिससे प्रकट होता है कि किसी समय जाति की सभ्यता का विकास पूर्ण रूप से था । आश्चर्य के साथ लिखना पड़ता है कि हिन्दू पुराणो में भर जाति का कोई जिक्र नही है। हाॅ केवल ब्रहमपुराण में जयध्वज के बंशज में भरताज शब्द का वर्णन है। संभवतः ये लोग महाभारत काल में भरताज नाम से विख्यात थे और पूर्वी भारत खण्ड में भीमसेन द्वारा पराजित हुये । 

9. अंग्रेजा ेने स्वीकार किया है कि इस जाति के बारे मे ंउन्हें विशेष ज्ञान नही है, फिर भी हम लोगों को प्राचीन आर्यो के दर्शन में रामराज के समय इनका कुछ आभास मिलता है और इस घटना के पश्चात् ये अतीत काल के लिये लुप्त हो जाते है और पुनः यवनकाल में वीर रस मे ंमतवाले नजर आते है। उस समय ये लोग बड़े बड़े गढ़ और राज्य के स्वामी बन बैठे थे । इनके राज्य का विस्तार अवध, काशी, पश्चिमी मगध, बुन्देलखण्ड, नागपुर और सागर के दक्षिणी प्रान्त तक था ।पार्ट -2 - 10. लेफ्टीनेन्ट गर्वनर मि0 थामसन ने हिन्दू ट्राईब्स एण्ड कास्ट पृष्ठ 363 में लिखे है कि अवध तथा आजमगढ़ के भर प्राचीन समय में बड़े बड़े पराक्रमी वीर चतुर कलाकार थे जो इनके कार्यो से प्रकट होता है। क्योकि इनके बनाये हुये प्राचीन कोट किले खाई, तालाब और पड़ाव विचित्र कारीगरियों से पूर्ण है। चाहे जो कुछ हो परन्तु यह मानना पड़ता है कि मुसलमानों के आक्रमण के पूर्व भर जाति का अधिपत्य इस देश के अधिक भू भाग पर था । यह लोग बारहवी शताब्दी के अन्त तक सम्पूर्ण अवध और बिहार आदि प्रान्तों पर अपना अधिकार जमाये हुये थे और बहुत दिनों तक बड़ी योग्यता के साथ यहाॅ राज्य करते थे । धीरे धीरे समय के परिवर्तन से इनकी अवनति होने लगी और पश्चिमी राजपूतों का प्रभाव पूरब की ओर बढ़ने लगा । इस प्रकार हिन्दुओं में पारस्परिक वैमनस्यता फैल गयी और उत्तरी हिन्दुस्तान पर मुसलमानों का आक्रमण होना प्रारम्भ हुआ, जिसके फलस्वरूप हिन्दू राजा शक्त्हिीन होकर यवनों द्वारा पराजित हुये । यद्यपि भर लोग अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये लगभग दो सौ वर्ष तक युद्ध करते रहे, परन्तु असंगठित और न्यून संख्या में होने के कारण तथा स्वधर्मियों के विरोध पक्ष ग्रहण कर लेने से अधिक समय तक न टिक सके । तथापि इनके कम गौरव का विषय नही है कि यह लोग देश की मर्यादा और स्वतंत्रता के लिये अपने सम्पूर्ण वैभव को नष्ट कर दिये । 

11. मिस्टर उडवन बन्दोबस्त अधिकारी, अवध प्रान्त ने अंकित किया है कि फैजाबाद के मंगलसी परगने के अंतर्गत तथा सन्निकट भर जाति के प्राचीन किले के खण्डहर अधिक संख्या में पाये जाते है। यद्यपि वे बहुत बड़े नही है, परन्तु सुदृृढ़ और कारीगरियों से पूर्ण है जो इनके विजेता शत्रुओं द्वारा नष्ट कर दिये गये हैं इनके किलो, कोटो, खाईयों को देखने से भारत के प्राचीन सभ्यता की स्मृतियाॅ नवीनता को धारण कर लेती है। साथ ही साथ भर जाति की उन्नतिशील दशा भी ध्यान आ जाता है जो स्वधर्मियों के विरोध पक्ष ग्रहण करने से इस दशा को प्राप्त हुये । भर जाति के शूर वीर, पराकर्मी, रणकुशल और कला निपुण होने के प्रमाण इनसे बढ़कर स्पष्ट और क्या हो सकता है। कुछ विद्यानो की राय है कि भर लोगों की सभ्यता दूसरों से सीखी हुयी अनुकरणीय सभ्यता है, परन्तु बहुत छान-बीन और निर्णय के पश्चात् यह मालुम हुआ कि उनकी यह सभ्यता उन्हीं द्वारा उपार्जित सभ्यता है। 

3. हिन्दू ट्राईब्स एण्ड कास्ट वालूम वन पृष्ठ 362 में मिस्टर सर ए0 कनिंघम लिखते है कि देश में स्थित प्राचीन किले, कोट, तालाब और इमारते जो बहुतायता से पायी जाती है, भर राजाओं की है। किसी समय देश में भरो का बोलबाला था, जिसके प्रभुत्व और सभ्यता की प्राचीन परम्परा आज तक चली आ रही है। निःसंदेह ये लोग उस समय अधिक संख्या में उत्तरी भारत में आबाद थे । 

4. अली हिस्ट्री आफ इण्डिया चतुर्थ इ0डी0 में डा0 स्मिथ ने लिखा है कि कुछ राजपूत प्राचीन निवासियों की संतान है। अर्थात मध्य प्रान्त तथा दक्षिण के गोंड और भर क्रमशः उन्नति करके अपने को राजपूत कहलाने लगे । इनके अनुसारे बुन्देल खण्ड के चंदेल, राजपूताने के राठौर भर जाति व दक्षिण के राष्ट्रकूट गाड की संतान है। 

5. महापंडित राहूत सांकृतायन ने अपनी पुस्तक सप्तमी के बच्चे शीर्षक डीह बाबा में लिखते है कि डीह बाबा भरों के पूर्वज थे । कौन सी भर जाति । ईशा से लगभग दो हजार वर्ष पूर्व जब आर्य भारत में आये तब ये हजारो वर्ष पूर्व जो जाति सभ्यता के उच्च शिखर पर पहुॅच चुकी थी, जिसने सुख और स्वच्छता युक्त हजारों भव्य प्रसादो वाले सुदृढत्र नगर बसाये थे, जिनके जहाॅ समुद्र में दूर तक यात्रा करते थे, व्यसन निमग्न पाकर आर्यो ने उनके सैकड़ों नगरों को ध्वस्त किया ता भी उनके की छाप आज भारत देश के नाम में है। वही भरत जाति या भर जाति विश्व की सबसे पुरानी सिन्धुघाटी की सभ्यता वाले भरतों(भरो) का आर्यो का युद्ध सिन्धुघाटी में हुआ था । 

     इसमें राहुल सांकृतायन साहब ने भरो की तारीफ के साथ साथ आर्यो से युद्ध बता दिये हैं । जबकि राजा ययाति के पाॅच लड़कों यदु तुर्वस दुहय अनु एवं पुरू को पंचजन आर्य कहा गया है। छटा बंश ऋषभ देव के पुत्रों को आर्य कहा गया है। बाहर से 2000 वर्ष पूर्व मलिच्छ आये थे जिन्हें इतिहासों में शक कुशाण हूण कहा गया है जो 8 वी शदी में सूर्य एवं अग्नि से शुद्ध होकर हिन्दू बने और भरतीय व्यवस्था को झटका देते रहे अन्त में महान भारत कई खण्डो में बटा और मुस्लिमों का प्रभाव बढ़ गया ।

: जिस दिन राजभर यह जान लेगा कि उसे राजभर जाति का तगमा क्यो मिला है । उस दिन उसके होश खुल जायेगे। लगेगा कि जिस कारण से हमे राजभर कहा गया उसका तो मै धूल भी नही हूॅ । राज के भार बहन करने वाले चंदेल, गहरवार भदौरिया, बैसवाड़ा बुन्देला, परिहार क्षेत्र के राजा ही राजभर कहे जाते थे । दुख की बात है कि 2200 वर्ष पहले से मंगोल क्षेत्र के पूरब से आने वाले शक कुशाण हूण धीरे धीरे भारत की व्यस्था को बिगाड़ने लगे । इसी को लेकर युद्ध होता रहा । लड़ाई से कुछ नही उखाड़ पाये तो हिन्दू बने और मुगलों के समय में जमीदार बनने तथा अंग्रेजो के समय मे ंभी रियासत दार बनने वालो जिन्होने लूटा व लुटवाया वे राजभरो के बंश को उजाड़ कर उन्हें मजदूर बना दिये । इनके साथ असली भारत के लोग बद से बदतर जीवन जीने लगे । राजभर को अपनी जाति के अनुसार कर्तव्य के लिये अब तैयार हो जाना चाहिए और 85 प्रतिशत लोगों के लिये सोने की चिड़िया वाले देश को ला देना चाहिए। पूजी वाद को समाप्त कराना एवं जमीदारी जैसे कब्जेदारी को मिटाकर सभी चीज सबके लिये उपलब्ध कराने की सबसे बड़ी चुनौती है।-डॉ पंचम राजभर -drprajbhar2962@gmail.com-9889506050-9452292260कुरथुवा सोनहरा मार्टीनगंज आज़मगढ़ उ प्र

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Grievance Status for registration number : PMOPG/E/2020/0712909 Grievance Concerns To Name Of Complainant डॉ पंचम राजभर Date of Receipt 05/08/2020 Received By Ministry/Department Prime Minister's Office Grievance Description महत्वपूर्ण/तत्काल प्रतिष्ठामें, माननीय संस्कृति मंत्री जी भारत सरकार नई दिल्ली सन्दर्भ - संस्कृति विभाग/पुरातत्व विभाग - विषय - भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा ऐतिहासिक/सांस्कृतिक भग्नावशेष को सरकारी संरक्षण में लिए जाने के सम्बंध में महोदय, आप अवगत ही हैं कि भारतीय संस्कृति सभ्यता के ऐतिहासिक साक्ष्यों यथा किला कोट,खण्डहर, के भग्नावशेष को सुरक्षित सुव्यवस्थित रखकर आमजनमानस के स्मृति में राजकीय संरक्षण प्रदान किये जाने की बहुप्रचलित वैधानिक कार्य सुनिश्चित है जो कि अत्यंत सराहनीय है उक्त के क्रम में सादर आपके संज्ञान में अवगत कराना है कि जनपद अम्बेडकरनगर के तहसील सदर एवं नगर पालिका अम्बेडकर नगर के वार्ड सं 19 सुझौली के अधीनस्थ लोरपुर अठखम्भा जो कि एक प्राचीन ऐतिहासिक, सांस्कृतिक धरोहर है जिसका वर्णन तत्कालीन भारशिव नागवंशी सुझावल के भर समुदाय के शासक द्वारा निर्मित होने का उल्लेख यूनाइटेड प्रविन्सेज ऑफ अवध के प्रामाणिक गजेटियर वॉल्यूम 3 N to Z में वर्णित है तथा वर्तमान में उक्त अष्ट खंभों का ऐतिहासिक अलौकिक साक्ष्य में से कुछ खम्भे पूरी तरह टूटकर गिरने के कगार पर है जो कि स्थानीय लोगों एवं भारशिव नागवंश बंशजों के प्राचीन काल से सुसभ्य संस्कृति, सभ्यता आस्था,विश्वास शोध का केंद्र है इतना ही नहीं स्थानीय लोगों ने शासन प्रशासन से उक्त अठ खंभें के अवशेष को पुनर्मरम्मत कर बचाये जाने का काफी प्रयास किया गया लेकिन सरकार द्वारा अभी तक कोई भी समुचित कार्यवाही नहीं हुई जिससे लोगों निराशा की भावना बलवती हो रही है अतः आपसे प्रबल अनुरोध है कि वर्णित परिस्थितियों में जनभावनाओं का समादर करते हुए भारतीय पुरातत्व विभाग सारनाथ वाराणसी सर्किल द्वारा उक्त जीर्ण शीर्ण अवस्था मे पड़े टूटे हुए सामग्री की पुनर्मरम्मत कर जीर्णोद्धार करते हुए सुरक्षित,सुव्यवस्थित संरक्षित रखे जाने हेतु सक्षम प्राधिकारी को निर्दर्शित कर वस्तुस्थिति से मुझे भी अवगत कराने की कृपा करें सम्मान सहित भवदीय डॉ पंचम राजभर Ex- सम्पादक -सुहेलदेव स्मृति (मा प) पूर्व राष्ट्रीय महासचिव ,अखिल भारतीय राजभर संगठन -- आवास- कुरथुवा ,सोनहरा आज़मगढ़ उ प्र 276301 मो 9452292260/9889506050 drprajbhar1962@gmail.com Current Status Case closed Date of Action 26/08/2020 Remarks Suggestion noted. Action is being taken. Rating 2 Average Rating Remarks महोदय कृपया सारनाथ सर्किल द्वारा स्थलीय सर्वेक्षणोपरांत अद्यतन विभागीय स्तर पर कृत कार्यवाही से हमें भी अवगत कराना चाहें डॉ पंचम राजभर Officer Concerns To Officer Name V S Badiger (Director) Organisation name Archeaological Survey of India Contact Address Dharohar Bhawan24 Tilak Marg Email Address vsbadiger.asi@gov.in Contact Number 01123004570