Maharaja Suheldev Bhar
आक्रांता का अर्थ होता है---
हमला करने वाला, आक्रमण करने वाला, Invader .
ग्यारहवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में भारत भूखंड छोटी-छोटी रियासतों में बटा हुआ था। रियासतों के राजा अपने राज्य की सीमा विवाद या वैवाहिक विवाद को लेकर आपसी झगड़ों में उलझे हुए रहा करते थे। भारत की इस कमजोरी का फायदा पश्चिमी देशों के शासक सदैव उठाने की कोशिश में रहते थे और भारत के राजाओं पर आक्रमण करने कि फिराक सदैव ही रहते थे। महमूद गजनवी का भारत पर आक्रमण उसी का नतीजा था। महमूद गजनवी की मृत्यु के बाद उसका भान्जा, सालार साहू का पुत्र, सैयद सालार सालार मसऊद गाजी भारत पर आक्रमण किया और भारत की छोटी छोटी रियासतों को जीतता हुआ नेपाल के बार्डर तक पहुंच गया। जिन जिन राजाओं को उसने जीता उनके विजित किलों पर गाजी अपना प्रतिनिधि वहां देख - रेख के लिए बैठाता गया। वह सूफी संत नहीं था उसकी महत्वाकांक्षा थी भारत पर अपना राज्य स्थापित करना। श्रावस्ती (अवध राज्य) के महाराजा सुहेलदेव राजभर ने योजनाबद्ध तरीके से देश के इक्कीस राजाओं को एकत्रित कर , सबकी विशाल सेना के साथ बहराइच (भरराइच, भर + राइच= भरों का प्रदेश) के नानपारा मैदान में आक्रांता गाजी को युद्ध के लिए ललकारा। सालार गाजी और सुहेलदेव राजभर का भीषण संग्राम इक्कीस दिनों तक चला, मौलाना मिनहाजुद्दीन सिराज, अबू उमर ई उस्मान द्वारा *सन् 1248* ई. में फारसी भाषा में लिखी गयी विश्वप्रसिद्ध पुस्तक *"तबकात ई नसीरी"*के भाग एक, पृष्ट 628 (इस पुस्तक को अंग्रेज इतिहासकार एच जी रावेर्टी ने अंग्रेजी में अनुवाद किया है) के अनुसार इस युद्ध में एक लाख बीस हजार मुसलमान मारे गये थे। इसी पृष्ट पर महाराजा सुहेलदेव राजभर की जाति फारसी भाषा में "बरतू" लिखी गयी है जिसे अवध गजेटियर में पैट्रिक कार्नेगी ने भर में कहा गया है। महाराजा सुहेलदेव की ओर से इस युद्ध में जिन सैनिकों ने शहादत दिया उन्हें "डीह" की उपाधि से नवाजा गया है और गाजी की ओर से जो सैनिक मारे गये उन्हें " शहीद या सैय्यद" कहा गया। उत्तर प्रदेश के गांवों में आज भी उनके लिए पूजा स्थान बने हुए हैं अपने देश को रौंदने वाला आक्रांता कभी पूज्यनीय नहीं हो सकता और न ही उसकी याद में कोई मेला ही नहीं लगवाया जा सकता। देश की सुरक्षा करने के वाले पूज्यनीय महाराजा सुहेलदेव राजभर और डीह होने चाहिए न कि गाजी मिंया या सैय्यद। गाजी मियां के मेले का हर जगह विरोध होना चाहिए और सरकार को ऐसे मेलों के आयोजनों की स्वीकृति नहीं देनी चाहिए। मुसलमान भाइयों को अपने देश को सर्वोपरि समझ कर देशहित में व्यवहार करना चाहिए।
----- डॉ पंचम राजभर